भगवान

           परमात्मा सशरीर प्रकट होते है
जब भगवान अपने स्थान सतलोक से चलकर आते है तो कवियों की तरह आचरण करते हैं और अपने तत्वज्ञान को जगह-जगह प्रकट होकर फैलाते है।


और जब वह परमात्मा पृथ्वी लोक पर आते है तो वह किसी माँ से जन्म नही लेता, कमल के फूल पर प्रकट होते है व उनकी परवरिश की लीला कंवारी गायों के दूध से होती है। 

मात-पिता मेरे कुछ नाही, ना मेरे घर दासी।
जुलहा का सुत आन कहाया, जगत करे मेरी हाँसी।।

5 वर्ष की अवस्था मे वह बड़े-बड़े विद्वानों के छक्के छुड़ा देते है।

 और ज्ञान सब ज्ञानड़ी, कबीर ज्ञान सो ज्ञान ।
जैसे गोला तोप का करता चले मैदान।।

परमात्मा कभी मरते नहीं उनका शरीर अजर अमर और अविनाशी तत्व से बना होता है।

जो बूझे सोए बावरा, क्या है उमर हमारी।
असंखो युग प्रलय गई, मैं तब का ब्रह्मचारी।।

जिसने ये लीला की वह परमात्मा

न मेरा जन्म न गर्भ बसेरा, बालक बन दिखलाया।
काशी नगर जल कमल पर डेरा, वहाँ जुलाहे ने पाया।।

और वह परमात्मा चारो युगों में आते है

सतयुग में सतसुकृत कह टेरा, त्रेता नाम मुनिन्द्र मेरा।
द्वापर में करूणामय कहलाया, कलियुग में नाम कबीर धराया।।


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